Delhi में गैंगस्टर कपिल संगवान के खिलाफ बिना मौजूदगी के शुरू हुई सुनवाई, BNSS के नए कानून का हुआ इस्तेमाल

Delhi: दिल्ली की एक अदालत में पहली बार फरार गैंगस्टर कपिल संगवान उर्फ नंदू के खिलाफ ‘ट्रायल इन एब्सेंटिया’ यानी बिना आरोपी की मौजूदगी के सुनवाई शुरू हुई। यह मामला जबरन वसूली (extortion) से जुड़ा है। यह पूरी प

Delhi: दिल्ली की एक अदालत में पहली बार फरार गैंगस्टर कपिल संगवान उर्फ नंदू के खिलाफ ‘ट्रायल इन एब्सेंटिया’ यानी बिना आरोपी की मौजूदगी के सुनवाई शुरू हुई। यह मामला जबरन वसूली (extortion) से जुड़ा है। यह पूरी प्रक्रिया नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 356 के तहत की गई है, जिसने पुराने CrPC की जगह ली है।

कपिल संगवान के खिलाफ यह सुनवाई 30 जुलाई 2026 को शुरू हुई। उससे पहले जून और जुलाई 2026 में उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए गए थे। 9 जुलाई 2026 को स्पेशल जज गोगने ने आरोपी को कानूनी सहायता (legal aid) देने का निर्देश दिया था। कपिल संगवान के बारे में बताया जाता है कि वह यूनाइटेड किंगडम में छिपा हुआ है और हरियाणा के INLD नेता नाफे सिंह राठी की हत्या के मामले में भी उसका नाम आता है।

BNSS की धारा 356 के तहत अब उन अपराधियों के खिलाफ सुनवाई और फैसला हो सकेगा जो जानबूझकर कोर्ट से बचने के लिए फरार रहते हैं। इस कानून के तहत कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी होती हैं। आरोपी को पहले धारा 84 BNSS के तहत ‘घोषित अपराधी’ (Proclaimed Offender) घोषित करना होता है। साथ ही, आरोप तय होने के बाद कम से कम 90 दिन का समय बीता होना चाहिए और दो बार गिरफ्तारी वारंट जारी होने चाहिए। कोर्ट को अखबार में नोटिस देना होता है और आरोपी के घर व पुलिस स्टेशन पर भी सूचना लगानी होती है।

यह नियम केवल उन गंभीर अपराधों पर लागू होता है जिनमें 10 साल या उससे ज्यादा की सजा, उम्रकैद या फांसी का प्रावधान है। अगर आरोपी का कोई वकील नहीं है, तो सरकार के खर्चे पर उसे वकील दिया जाता है। गवाहों के बयान और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग को सबूत के तौर पर मान्य किया जाएगा। अगर आरोपी बाद में कोर्ट आता है, तो उसे पुराने सबूतों पर cross-examine करने का मौका मिलेगा। फैसला आने के बाद अपील केवल तभी की जा सकती है जब आरोपी खुद कोर्ट में पेश हो, और यह समय सीमा फैसले के तीन साल तक ही होगी।

डीसीपी (आउटर नॉर्थ) हरेश्वर स्वामी ने कहा कि इस प्रावधान का मकसद उन आरोपियों को रोकना है जो फरार होकर न्याय की प्रक्रिया को धीमा करते हैं। इससे अब अपराधियों की जवाबदेही तय होगी और मामलों का निपटारा जल्दी हो सकेगा।