Darbhanga के ऐतिहासिक तालाबों पर कब्जे का मामला पहुंचा Supreme Court, बिहार सरकार से मांगा जवाब

Darbhanga: दरभंगा के ऐतिहासिक तालाबों को बचाने की लड़ाई अब देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गई है। शहर के तीन पुराने और महत्वपूर्ण तालाबों पर हुए कथित अतिक्रमण के मामले में Supreme Court ने संज्ञान लिया है और बिहार सरकार

Darbhanga: दरभंगा के ऐतिहासिक तालाबों को बचाने की लड़ाई अब देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गई है। शहर के तीन पुराने और महत्वपूर्ण तालाबों पर हुए कथित अतिक्रमण के मामले में Supreme Court ने संज्ञान लिया है और बिहार सरकार से इस पर जवाब मांगा है। यह मामला तब शुरू हुआ जब स्थानीय नागरिकों के एक समूह ने इन जल निकायों को बचाने के लिए याचिका दायर की।

मामला मुख्य रूप से हराही, दिग्घी और गंगासागर तालाबों से जुड़ा है। ये तालाब करीब 800 से 1000 साल पुराने बताए जाते हैं। ‘तालाब बचाओ अभियान’ (TBA) नाम के एक नागरिक समूह ने याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि इन प्राचीन तालाबों के संरक्षण की अनदेखी की जा रही है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बिहार शहरी आधारभूत संरचना विकास निगम लिमिटेड (BUDCO) सुंदरीकरण के नाम पर तालाबों के कुछ हिस्सों को भर रहा है और वहां कियोस्क, रेस्तरां और फुटपाथ जैसी व्यावसायिक सुविधाएं बनाई जा रही हैं।

याचिका में यह बात उठाई गई कि तालाबों को भरना National Green Tribunal (NGT), हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का सीधा उल्लंघन है। इसके साथ ही वेटलैंड्स (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि सभी अवैध कब्जों को तुरंत हटाया जाए और इन तालाबों को 1868 और 1960 के नक्शों के आधार पर उनकी पुरानी स्थिति में वापस लाया जाए।

दरभंगा की स्थिति काफी चिंताजनक रही है। आंकड़ों के मुताबिक, 1964 में इस शहर को तालाबों का शहर कहा जाता था और तब यहां करीब 350 तालाब थे, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर 100 से भी कम रह गई है। पिछले 60 सालों में 250 से ज्यादा तालाब गायब हो चुके हैं। विवादित तीन तालाबों का कुल क्षेत्र 253 बीघा था, जिसमें से 25 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अब कब्जे में है। इसके अलावा धोबिया पोखर जैसे अन्य ऐतिहासिक तालाब भी अतिक्रमण की चपेट में हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे सीधे सुनवाई के लिए स्वीकार किया है। इससे पहले 13 अप्रैल 2026 को भी कोर्ट ने इस पर चिंता जताई थी और नोटिस जारी किया था। अब बिहार सरकार को अदालत में बताना होगा कि इन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।