Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र जेल (फरलो और पैरोल) नियम, 2024 के एक खास हिस्से को खत्म कर दिया है। अब कैदियों को रेगुलर पैरोल मिलने के लिए एक साल की वास्तविक सजा पूरी करने की जरूरत नहीं होगी। कोर्ट ने इस निय
Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र जेल (फरलो और पैरोल) नियम, 2024 के एक खास हिस्से को खत्म कर दिया है। अब कैदियों को रेगुलर पैरोल मिलने के लिए एक साल की वास्तविक सजा पूरी करने की जरूरत नहीं होगी। कोर्ट ने इस नियम को गलत और असंवैधानिक माना है, जिससे अब कम सजा वाले कैदियों को भी पैरोल मिल सकेगी।
कोर्ट ने इस नियम को क्यों हटाया?
जस्टिस माधव जामदार और जस्टिस प्रवीण पाटिल की बेंच ने कहा कि पैरोल देना मानवीय आधार पर लिया जाने वाला फैसला है। कोर्ट के मुताबिक, सिर्फ जेल में बिताए गए समय के आधार पर किसी को पैरोल से रोकना गलत है। यह नियम संविधान के आर्टिकल 14 और 21 का उल्लंघन करता है, इसलिए इसे हटाना जरूरी था।
यह पूरा मामला क्या था?
एक व्यक्ति को Negotiable Instruments Act के तहत एक साल की सजा हुई थी। जब उसने पैरोल के लिए आवेदन किया, तो जेल अधिकारियों ने Rule 14(1) का हवाला देते हुए उसे मना कर दिया। नियम के मुताबिक, पैरोल के लिए कम से कम एक साल जेल में रहना जरूरी था। इसी के खिलाफ याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद कोर्ट ने यह फैसला सुनाया।
अब कैदियों पर क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले के बाद महाराष्ट्र की जेलों में उन कैदियों को राहत मिलेगी जिनकी सजा कम है या जिन्होंने अभी एक साल पूरा नहीं किया है। अब जेल प्रशासन केवल समय की शर्त के आधार पर पैरोल आवेदन को खारिज नहीं कर पाएगा। पैरोल की प्रक्रिया अब अधिक मानवीय और नियमों के बजाय जरूरतों पर आधारित होगी।
Frequently Asked Questions (FAQs)
बॉम्बे हाई कोर्ट ने किस नियम को हटाया है?
कोर्ट ने महाराष्ट्र Prisons (Furlough and Parole) Rules, 2024 के Rule 14(1) के उस हिस्से को हटाया है, जिसमें रेगुलर पैरोल के लिए एक साल की जेल सजा पूरी करना अनिवार्य था।
कोर्ट ने इस नियम को असंवैधानिक क्यों माना?
कोर्ट का मानना था कि पैरोल मानवीय आधार पर दी जाती है और केवल समय की शर्त लगाना मनमाना है। यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ था।