Mumbai Police के externment order को Bombay High Court ने किया खारिज, SDPI सदस्यों को मिली राहत

Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस द्वारा SDPI के दो सदस्यों के खिलाफ जारी तड़ीपार (externment) आदेशों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि नागरिकों को अपनी राजनीतिक राय रखने का पूरा हक है। यह फैसला 28 जुलाई

Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस द्वारा SDPI के दो सदस्यों के खिलाफ जारी तड़ीपार (externment) आदेशों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि नागरिकों को अपनी राजनीतिक राय रखने का पूरा हक है। यह फैसला 28 जुलाई 2026 को सुनाया गया, जिससे फिरोज अब्दुल वहब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी को बड़ी राहत मिली है।

मुंबई पुलिस ने 3 दिसंबर 2025 को इन दोनों सदस्यों को एक साल के लिए शहर से बाहर रहने का आदेश दिया था। यह कार्रवाई वक्फ बिल, चेंबूर-गोवंडी इलाके में सीमेंट फैक्ट्री से होने वाले प्रदूषण और बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर किए गए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी FIR के आधार पर की गई थी। जस्टिस माधव जामदार ने इन याचिकाओं की सुनवाई की और पुलिस के इस कड़े कदम को सही नहीं माना।

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि केवल विरोध प्रदर्शनों और नारेबाजी वाली FIR के आधार पर किसी व्यक्ति को शहर से बाहर निकालना गलत है, खासकर तब जब इन प्रदर्शनों में कांग्रेस, शिवसेना (UBT) और NCP जैसे अन्य दलों के कार्यकर्ता भी शामिल थे, लेकिन उनके खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई। जस्टिस जामदार ने यह भी कहा कि “बाबरी मस्जिद नहीं गिराई जानी चाहिए थी” जैसी राय रखना देश विरोधी टिप्पणी नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि तड़ीपार करना एक असाधारण कदम है, जो व्यक्ति के घूमने और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे बुनियादी अधिकारों को छीनता है। इसलिए ऐसी कार्रवाई महाराष्ट्र पुलिस एक्ट की धारा 56 के नियमों का सख्ती से पालन करने के बाद ही होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी पाया कि जिन मामलों की जांच अभी चल रही है, उन्हें इस तरह के कड़े फैसले का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।

सुनवाई के दौरान स्टेट के चीफ पब्लिक प्रॉसिक्यूटर शिशिर हीराय ने इन आदेशों का बचाव किया और याचिकाकर्ताओं का संबंध प्रतिबंधित PFI से होने का दावा किया। वहीं याचिकाकर्ताओं के वकील इब्राहिम हरबत ने दलील दी कि पुलिस ने धारा 56 के प्रावधानों का सही इस्तेमाल नहीं किया। कोर्ट ने मोहम्मद रफीक के मामले में एक और सुनवाई 6 अगस्त को तय की है, जिसमें राज्य सरकार को {atrocities act} के तहत लंबित एक अन्य FIR पर हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है।