Maharashtra में निजी जमीन को सरकारी जंगल घोषित करने पर बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, जमीन मालिकों को मिलेगी राहत
Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि महाराष्ट्र सरकार बिना सही कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी भी निजी जमीन को अपने आप सरकारी जंगल घोषित नहीं कर सकती। कोर्ट के इस फैसले से राज्यभर में विवादित जमीन
Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि महाराष्ट्र सरकार बिना सही कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी भी निजी जमीन को अपने आप सरकारी जंगल घोषित नहीं कर सकती। कोर्ट के इस फैसले से राज्यभर में विवादित जमीनों के सैकड़ों मालिकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की बेंच ने यह आदेश दिया है।
अदालत ने कहा कि सरकार को इंडियन फॉरेस्ट एक्ट, 1927 की धारा 35 में बताए गए नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। इसके तहत पहले जमीन मालिक को नोटिस देना, उसकी आपत्तियां सुनना और उन पर विचार करना जरूरी है। इसके बाद ही धारा 35(1) के तहत औपचारिक अधिसूचना जारी की जा सकती है। कोर्ट ने सरकार की इस सोच को गलत बताया कि 30 अगस्त 1975 को मौजूद हर वन भूमि अपने आप सरकारी हो गई।
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की और कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों को बार-बार नजरअंदाज कर रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। अब सरकार को एक कमेटी बनानी होगी, जिसका नेतृत्व डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट रैंक का अधिकारी करेगा। यह कमेटी सभी लंबित मामलों की जांच करेगी और जिन लोगों के नाम गलत तरीके से राजस्व रिकॉर्ड से हटाए गए थे, उन्हें वापस जोड़ने का काम करेगी।
इस फैसले का असर व्यक्तिगत जमीन मालिकों, हाउसिंग सोसायटियों, चैरिटेबल ट्रस्ट, शिक्षण संस्थानों और कंपनियों पर पड़ेगा। कोर्ट के सामने आए 184 याचिकाओं में ठाणे जिले के शाहपुर, उल्हासनगर और मुरबाड के कई प्लॉट शामिल थे। हालांकि, कोर्ट ने यह भी गौर किया कि सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2026 में ठाणे के मानपाडा में 193 एकड़ जमीन को निजी जंगल से मुक्त करने वाले एक आदेश पर रोक लगाई थी, जिससे पता चलता है कि ऐसे मामलों में कानूनी पेचीदगियां अभी भी बनी हुई हैं।