Mumbai में जमीन विवाद पर Bombay High Court का बड़ा फैसला, Andheri के प्लॉट के लिए हाउसिंग सोसाइटी की याचिका खारिज
Maharashtra: मुंबई के Andheri West में जमीन के एक टुकड़े को लेकर चल रहे विवाद में Bombay High Court ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक हाउसिंग सोसाइटी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें वह पड़ोसी सोसाइटी की जमीन प
Maharashtra: मुंबई के Andheri West में जमीन के एक टुकड़े को लेकर चल रहे विवाद में Bombay High Court ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक हाउसिंग सोसाइटी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें वह पड़ोसी सोसाइटी की जमीन पर अपना दावा ठोक रही थी। जस्टिस संदीप मारणे ने साफ कहा कि कोर्ट किसी भी सोसाइटी को दूसरी सोसाइटी की जमीन हड़पने में मदद नहीं करेगा।
यह पूरा मामला Andheri के करीब 3 एकड़ जमीन से जुड़ा है। Kuber Kartik New Link Road Premises Co-op Society Ltd ने दावा किया था कि उन्हें 2.5 एकड़ जमीन मिलनी चाहिए, जबकि उन्हें केवल 1.7 एकड़ ही मिली थी। दूसरी तरफ, Krishna Society को 30 मार्च 2026 को डिप्टी रजिस्ट्रार के आदेश के बाद 1.15 एकड़ जमीन मिली थी। Kuber Kartik सोसाइटी ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर किसी सोसाइटी को गलती से उसके हक से कम जमीन मिली है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पड़ोसी सोसाइटी उस बची हुई जमीन पर कब्जा कर ले। जस्टिस संदीप मारणे ने टिप्पणी की कि यह कोर्ट याचिकाकर्ता की जमीन हड़पने की कोशिश का हिस्सा नहीं बन सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘डीम्ड कन्वेंस’ (Deemed Conveyance) सर्टिफिकेट जमीन के अधिकारों की अंतिम मुहर नहीं होता है।
अदालत ने याचिकाकर्ता सोसाइटी को यह रास्ता बताया कि अगर वे डिप्टी रजिस्ट्रार के फैसले से खुश नहीं हैं, तो वे अलग से सिविल सूट फाइल कर सकते हैं। इस मामले में याचिकाकर्ता के वकील मयूर खांडेपर्कर ने ज्यादा जमीन का दावा किया था, जबकि कृष्णा सोसाइटी के वकील अमोघ सिंह ने बताया कि सुधार के बाद डिप्टी रजिस्ट्रार ने उनकी सोसाइटी का क्षेत्रफल बढ़ा दिया था।
यह फैसला महाराष्ट्र ओनरशिप फ्लैट्स एक्ट (MOFA), 1963 के नियमों के तहत आया है। नियम के मुताबिक, बिल्डर को सोसाइटी बनने के बाद तय समय में जमीन का ट्रांसफर करना होता है, वरना सोसाइटी सक्षम अधिकारी के पास डीम्ड कन्वेंस के लिए आवेदन कर सकती है। कोर्ट ने माना कि इस मामले में 30 मार्च 2026 को हुआ कन्वेंस एक तरह का न्यायिक अतिरेक (judicial overreach) था, लेकिन इसका समाधान अलग कानूनी प्रक्रिया से होगा, न कि इस याचिका के जरिए।