Bihar के नालंदा की बावन बूटी साड़ी को मिला GI टैग, अब दुनिया भर में बढ़ेगी बुनकरों की पहचान

Bihar/Nalanda: बिहार की पारंपरिक कला और संस्कृति को एक बड़ी पहचान मिली है। नालंदा की मशहूर बावन बूटी साड़ी और फैब्रिक को आधिकारिक तौर पर GI टैग दे दिया गया है। इसके साथ ही गया के पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पिध

Bihar/Nalanda: बिहार की पारंपरिक कला और संस्कृति को एक बड़ी पहचान मिली है। नालंदा की मशहूर बावन बूटी साड़ी और फैब्रिक को आधिकारिक तौर पर GI टैग दे दिया गया है। इसके साथ ही गया के पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पिधिया पेंटिंग को भी यह सम्मान मिला है। जून 2026 के मध्य में आई यह खबर राज्य के बुनकरों और शिल्पकारों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है।

बावन बूटी साड़ी की खासियत इसके कपड़ों पर बने 52 पारंपरिक बौद्ध और सांस्कृतिक प्रतीकों (बूटी) में है, जिन्हें बहुत बारीकी से बुना जाता है। यह काम मुख्य रूप से नालंदा के बिहारशरीफ ब्लॉक के बसवन बीघा और सिलाओ ब्लॉक के नेपुरा गांव के बुनकर करते हैं। इन साड़ियों को पारंपरिक फ्रेम और पिट लूम पर ‘एक्स्ट्रा वेफ्ट’ तकनीक से बनाया जाता है। हालांकि यह मुख्य रूप से रेशम और सूती साड़ियों के लिए जाना जाता है, लेकिन इसी तकनीक से चादरें और पर्दे भी तैयार किए जाते हैं।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इसे बिहार की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। उन्होंने कहा कि इससे ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को मजबूती मिलेगी और स्थानीय कलाकारों की कमाई बढ़ेगी। नाबार्ड (NABARD) के बिहार सीजीएम गौतम कुमार सिंह ने बताया कि GI टैग मिलना सिर्फ एक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह एक शुरुआत है। अब नाबार्ड और बिहार सरकार मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि इस पहचान का सीधा आर्थिक लाभ उत्पादकों तक पहुंचे।

इस पूरी प्रक्रिया में नाबार्ड और बिहार सरकार ने मिलकर काम किया, जबकि वाराणसी के ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन ने तकनीकी सहयोग दिया। बसवन बीघा प्राथमिक बुनकर सहयोग समिति ने इसके लिए आवेदन किया था। पद्मश्री कपिल देव प्रसाद ने भी इस बुनाई शैली को बचाने और बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। नेपुरा की बुनकर सुशीला देवी जैसी महिलाओं का मानना है कि इस टैग से उनके काम की सही कीमत मिलेगी और काम करने की स्थिति में सुधार होगा।

GI टैग के नियमों के मुताबिक, यह रजिस्ट्रेशन 10 साल के लिए मान्य होता है और बाद में इसे रिन्यू कराया जा सकता है। यह टैग चेन्नई स्थित ज्योग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री द्वारा दिया जाता है। इसका मुख्य मकसद उन उत्पादों को कानूनी सुरक्षा देना है जो किसी खास इलाके की पहचान होते हैं, ताकि कोई दूसरा उनकी नकल न कर सके और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी साख बनी रहे।