Bihar : भागलपुर की माटी से निकलकर भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचने वाले अशोक कुमार की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणा है. वे सिर्फ एक महान अभिनेता ही नहीं थे, बल्कि एक कुशल चित्रकार और होम्योपैथ डॉक्टर भी थे. उन्होंने फिल्म
Bihar : भागलपुर की माटी से निकलकर भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचने वाले अशोक कुमार की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणा है. वे सिर्फ एक महान अभिनेता ही नहीं थे, बल्कि एक कुशल चित्रकार और होम्योपैथ डॉक्टर भी थे. उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में ‘नेचुरल एक्टिंग’ की शुरुआत की और ‘कुमार’ सरनेम को घर-घर में लोकप्रिय बनाया.
अशोक कुमार का शुरुआती जीवन और एक्टिंग में एंट्री कैसे हुई?
अशोक कुमार का जन्म 13 अक्टूबर 1911 को बिहार के भागलपुर में हुआ था. उनके पिता कुंजलाल गांगुली वकील थे और माता गौरी देवी थीं. उनका बचपन भागलपुर के आदमपुर मोहल्ले में बीता. दिलचस्प बात यह है कि उनकी रुचि शुरू में एक्टिंग में नहीं थी, वे तकनीकी क्षेत्र या निर्देशन में जाना चाहते थे. 1934 में उन्होंने New Theatres में लैब असिस्टेंट के तौर पर काम शुरू किया. 1936 में फिल्म ‘जीवन नैया’ के मुख्य अभिनेता के बीमार होने पर उन्हें अचानक मौका मिला और अभिनेत्री देविका रानी ने उनका नाम कुमुदलाल से बदलकर अशोक कुमार रख दिया.
सुपरस्टारडम और उनकी खास उपलब्धियां क्या रहीं?
अशोक कुमार को भारतीय सिनेमा का पहला सुपरस्टार माना जाता है क्योंकि उन्होंने बिना भारी मेकअप के सहज अभिनय यानी ‘नेचुरल एक्टिंग’ की नींव रखी. उनकी फिल्म ‘किस्मत’ (1943) ने उस दौर में 1 करोड़ रुपये की कमाई की और कलकत्ता के चित्रा थिएटर में लगातार 196 हफ्तों तक चली. उन्होंने करीब 300 फिल्मों में काम किया और एंटी-हीरो का किरदार निभाने वाले पहले मुख्य अभिनेताओं में से एक थे.
पुरस्कार और अन्य प्रतिभाएं जो उन्हें खास बनाती थीं
एक्टिंग के अलावा अशोक कुमार एक बेहतरीन पेंटर थे और उन्होंने अपने दादा-दादी के ऑयल पेंटिंग्स बनाए थे. वे एक होम्योपैथी डॉक्टर भी थे और उन्होंने कई मरीजों का मुफ्त इलाज किया. भारत सरकार ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें कई बड़े सम्मान दिए:
| पुरस्कार |
वर्ष |
| पद्म श्री |
1962 |
| नेशनल फिल्म अवार्ड (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) |
1968 |
| दादा साहब फाल्के पुरस्कार |
1988 |
| पद्म भूषण |
1999 |
भारतीय सिनेमा के इस दिग्गज कलाकार का निधन 10 दिसंबर 2001 को मुंबई में हुआ.