Bihar के BAU सबौर ने शुरू किया ‘मिशन आम गुठली’, अब कचरे से बनेगी कमाई; किसानों और युवाओं को मिलेंगे नए मौके

Bhagalpur: बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर ने आम की गुठली को कचरे से कमाई में बदलने के लिए ‘मिशन आम गुठली’ की शुरुआत की है। सोमवार, 6 जुलाई 2026 को आयोजित एक वर्कशॉप के जरिए इस अभियान का आगाज हुआ। इस पहल

Bhagalpur: बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर ने आम की गुठली को कचरे से कमाई में बदलने के लिए ‘मिशन आम गुठली’ की शुरुआत की है। सोमवार, 6 जुलाई 2026 को आयोजित एक वर्कशॉप के जरिए इस अभियान का आगाज हुआ। इस पहल का मुख्य उद्देश्य आम की गुठलियों का वैज्ञानिक तरीके से संग्रह करना और उनसे कीमती उत्पाद तैयार करना है ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिले।

BAU के कुलपति प्रोफेसर डी.आर. सिंह ने बताया कि आम की गुठली कोई कचरा नहीं बल्कि एक मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन है। उन्होंने कहा कि अगर इन गुठलियों का सही तरीके से संग्रह और प्रोसेसिंग की जाए, तो इनसे भोजन, औद्योगिक उपयोग और बायो-बेस्ड उत्पादों के लिए उच्च मूल्य वाली चीजें बनाई जा सकती हैं। यह कदम टिकाऊ विकास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की दिशा में एक बड़ा प्रयास है।

इस मिशन के तहत साफ-सफाई, पर्यावरण सुरक्षा और ग्रामीण उद्यमिता को जोड़ा गया है। इससे किसानों, युवाओं और उद्यमियों के लिए कमाई के नए रास्ते खुलेंगे। कुलपति ने विश्वविद्यालय के लोगों और भागलपुर जिले के निवासियों से अपील की है कि वे आम की गुठलियों को साफ करके और सुखाकर निर्धारित कलेक्शन सेंटरों पर जमा करें। यूनिवर्सिटी का नेचर क्लब समय-समय पर इन गुठलियों को इकट्ठा करेगा, जिनका उपयोग फूड, न्यूट्रास्युटिकल्स और कॉस्मेटिक्स जैसे उत्पाद बनाने में किया जाएगा।

यह अभियान केवल यूनिवर्सिटी कैंपस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे सबौर शहर और भागलपुर जिले के अन्य इलाकों में भी फैलाया जाएगा। इस वर्कशॉप में डीन, डायरेक्टर, बिहार एग्रीकल्चर कॉलेज के प्रिंसिपल और बागवानी विभाग के कई वैज्ञानिक मौजूद थे।

बता दें कि इस मिशन से पहले BAU के वैज्ञानिकों ने आम की गुठली के बीज से पाउडर और बटर ऑयल बनाने की तकनीक विकसित की थी। साथ ही, आम के छिलके से कार्बन क्वांटम डॉट्स (CQDs) तैयार किए गए थे। अगस्त 2025 में यूनिवर्सिटी ने आम की गुठली से एक ऐसा हाइड्रोजेल बनाने का पेटेंट भी हासिल किया था, जो अपने वजन से 400% ज्यादा पानी सोख सकता है। यह तकनीक खेती में सिंचाई की लागत कम करने और सूखे के समय फसलों को बचाने में मददगार साबित होगी। रिसर्च साइंटिस्ट वी शाजीदा बानू और रिसर्च डायरेक्टर अनिल कुमार सिंह ने बताया कि इन तकनीकों से किसानों और उद्योगों को सीधा फायदा होगा और प्रदूषण भी कम होगा।