Bhagalpur में थैलेसीमिया से बचाव के लिए माता-पिता की HPLC जांच जरूरी, सरकारी स्कीम से मिल रही मदद

Bhagalpur: शहर में जन्मजात बीमारियों से जूझ रहे बच्चों और उनके परिवारों के लिए स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय अस्पताल जरूरी दिशा-निर्देश जारी कर रहे हैं। थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से बच्चों को बचाने के लिए अब माता-पिता की

Bhagalpur: शहर में जन्मजात बीमारियों से जूझ रहे बच्चों और उनके परिवारों के लिए स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय अस्पताल जरूरी दिशा-निर्देश जारी कर रहे हैं। थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से बच्चों को बचाने के लिए अब माता-पिता की जांच पर जोर दिया जा रहा है। जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (JLNMCH) के डॉक्टर लोगों को जागरूक कर रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ी को इस दर्दनाक बीमारी से बचाया जा सके।

डॉक्टरों का कहना है कि शादी से पहले या बच्चा पैदा करने से पहले माता-पिता को HPLC (High-Performance Liquid Chromatography) टेस्ट जरूर कराना चाहिए। यह एक साधारण जांच है जिससे पता चल जाता है कि माता-पिता में थैलेसीमिया के जीन हैं या नहीं। अगर दोनों पार्टनर इस बीमारी के वाहक होते हैं, तो बच्चे में थैलेसीमिया होने का खतरा रहता है। जेनेटिक काउंसलिंग के जरिए भविष्य में इस बीमारी को रोकने में मदद मिलती है।

JLNMCH के पीडियाट्रिक्स विभाग के हेड डॉ. अंकुर प्रियदर्शी के नेतृत्व में थैलेसीमिया डे केयर सेंटर चलाया जा रहा है। यहाँ हर महीने 300 से ज्यादा मरीज आते हैं जिन्हें नियमित रूप से खून चढ़ाया जाता है। मरीजों को साइड इफेक्ट्स से बचाने के लिए ल्यूको-फिल्टर्ड ब्लड और आयरन चेलेशन की दवा (Deferasirox) मुफ्त दी जा रही है।

बिहार सरकार की ‘मुख्यमंत्री बाल थैलेसीमिया योजना’ के तहत 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बड़ी राहत दी जा रही है। अगर बच्चे का HLA मैच उसके भाई या बहन से होता है, तो बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) के लिए CMC Vellore में इलाज का खर्च सरकार उठाती है। इसके लिए 15 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद दी जाती है, जिसमें हवाई यात्रा, रहने और खाने का खर्च भी शामिल है। मई 2026 तक इस योजना से 43 बच्चे सफल ट्रांसप्लांट करा चुके हैं।

हालांकि, शहर में खून की उपलब्धता को लेकर कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। जुलाई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ प्राइवेट ब्लड बैंक थैलेसीमिया मरीजों को खून देने में आनाकानी कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने 174 मरीजों को चार ब्लड बैंकों (दो सरकारी और दो प्राइवेट) से जोड़ा था, लेकिन प्राइवेट बैंकों द्वारा खून न मिलने से परिजन परेशान हैं। सिविल सर्जन इस मामले को सुलझाने के लिए मुख्यालय से सुझाव मांग रहे हैं।