Bihar : भागलपुर के सन्हौला प्रखंड के रमासी गाँव को अब ‘सिंदूर ग्राम’ के रूप में विकसित किया जाएगा। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) सबौर ने इस खास प्रोजेक्ट की शुरुआत की है ताकि ग्रामीण इलाकों में हरित विकास हो
Bihar : भागलपुर के सन्हौला प्रखंड के रमासी गाँव को अब ‘सिंदूर ग्राम’ के रूप में विकसित किया जाएगा। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) सबौर ने इस खास प्रोजेक्ट की शुरुआत की है ताकि ग्रामीण इलाकों में हरित विकास हो सके और महिलाएं खुद का काम शुरू कर आत्मनिर्भर बन सकें। इस योजना के तहत प्राकृतिक सिंदूर की खेती और उसके प्रसंस्करण पर जोर दिया जा रहा है।
सिंदूर ग्राम परियोजना क्या है और कैसे होगा काम
BAU सबौर ने रमासी गाँव को गोद लिया है जहाँ लगभग एक हजार सिंदूर के पौधे लगाए जाएंगे। इन पौधों की देखरेख गाँव की महिलाएं खुद करेंगी। वैज्ञानिकों की टीम अभी जमीन की उर्वरता और जलवायु की जांच कर रही है। सिंदूर के ये पौधे तीन साल बाद फल देना शुरू करेंगे, जिससे गाँव में कुटीर उद्योग का रास्ता खुलेगा।
किसे मिलेगा फायदा और क्या है वैज्ञानिक आधार
यह पूरी पहल बिक्सा ओरियाना के प्राकृतिक बिक्सिन पिगमेंट पर आधारित है, जिससे स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होगा। कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह और अन्य वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में यह काम हो रहा है। कटिहार की रीना सिंह को बिहार स्टार्टअप की तरफ से इस प्राकृतिक सिंदूर के बिजनेस के लिए 10 लाख रुपये का अनुदान भी मिला है।
प्रोजेक्ट की मुख्य बातें और लक्ष्य
- BAU सबौर की टिश्यू कल्चर लैब में सिंदूर के पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
- डॉ. शाजिदा बानो ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पहले ही 200 पौधे लगाए हैं।
- लक्ष्य इस उत्पाद को नेशनल मार्केट और बड़ी कंपनियों से जोड़ना है ताकि किसानों को सही दाम मिले।
- पारंपरिक वनस्पति को आधुनिक कमाई के जरिए से जोड़ना इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
सिंदूर ग्राम परियोजना का मुख्य उद्देश्य क्या है
इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को प्राकृतिक सिंदूर की खेती और प्रोसेसिंग के जरिए आत्मनिर्भर बनाना, पर्यावरण का संरक्षण करना और हरित विकास को बढ़ावा देना है।
सिंदूर के पौधे कितने समय में फल देते हैं
BAU सबौर के अनुसार, सिंदूर के पौधे लगाने के लगभग तीन वर्षों के बाद फल देना शुरू कर देते हैं।