UP: दहेज उत्पीड़न पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- बेटी की शिकायत को सामान्य विवाद मानकर नजरअंदाज न करें परिवार
UP/Lucknow: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दहेज उत्पीड़न के मामलों में परिवारों की भूमिका को लेकर एक बहुत जरूरी बात कही है। कोर्ट ने साफ किया है कि अगर कोई बेटी ससुराल में प्रताड़ना की शिकायत लेकर अपने मायके आती है,
UP/Lucknow: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दहेज उत्पीड़न के मामलों में परिवारों की भूमिका को लेकर एक बहुत जरूरी बात कही है। कोर्ट ने साफ किया है कि अगर कोई बेटी ससुराल में प्रताड़ना की शिकायत लेकर अपने मायके आती है, तो उसे मामूली झगड़ा मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। यह शिकायत असल में मदद और सुरक्षा की एक पुकार हो सकती है।
यह मामला श्रावस्ती जिले के 2011 के एक दहेज हत्या केस से जुड़ा है। 3 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की पीठ ने दोषियों की अपील पर फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि परिवार की यह नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी बेटी की बात पर भरोसा करे और उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए।
अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि अक्सर परिवारों द्वारा महिलाओं को समझौता करने या घर बचाने की सलाह दी जाती है। कोर्ट के मुताबिक ऐसी सलाह अनजाने में प्रताड़ित करने वालों के हौसले बढ़ा देती है। समय पर सही हस्तक्षेप से किसी महिला की जान बचाई जा सकती है, जबकि बाद में कानूनी प्रक्रिया से दोषियों को सजा दिलाना जान बचाने का विकल्प नहीं हो सकता।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि दहेज जैसी सामाजिक बुराई से लड़ने का काम सिर्फ अदालतों का नहीं है। इसमें परिवारों, रिश्तेदारों और पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि किसी महिला को चुपचाप प्रताड़ना सहने के लिए मजबूर न किया जाए।
इसके साथ ही कोर्ट ने बताया कि IPC की धारा 498ए और 304बी केवल सजा देने के लिए नहीं, बल्कि अपराधों को रोकने और महिलाओं को कानूनी सुरक्षा देने के लिए बनाई गई हैं। हालिया फैसलों में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि दहेज हत्या का मामला तभी बनेगा जब क्रूरता साबित हो, सिर्फ कीमती चीजों की मांग को दहेज हत्या का अपराध नहीं माना जा सकता।