Finance: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल अब कंपनियों के लिए महंगा साबित हो रहा है। शुरुआत में हर काम के लिए AI अपनाने की सलाह दी गई थी, लेकिन अब कंपनियों को इसके भारी-भरकम बिलों का सामना करना पड़ रहा है। Financia
Finance: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल अब कंपनियों के लिए महंगा साबित हो रहा है। शुरुआत में हर काम के लिए AI अपनाने की सलाह दी गई थी, लेकिन अब कंपनियों को इसके भारी-भरकम बिलों का सामना करना पड़ रहा है। Financial Express Mumbai की रिपोर्ट के मुताबिक, कई बिजनेस अब अपने खर्चों को कम करने के लिए AI के इस्तेमाल की रफ्तार धीमी कर रहे हैं।
कंपनियों पर कैसे पड़ा AI खर्च का असर
AI टूल्स और उनके इस्तेमाल के लिए दिए जाने वाले ‘टोकन’ की कीमत इतनी बढ़ गई है कि बड़ी कंपनियां भी परेशान हैं। Uber ने तो अप्रैल तक ही अपना पूरे साल का AI बजट खत्म कर लिया, जिसके बाद उसने कर्मचारियों के लिए महीने का खर्च 1,500 डॉलर तय कर दिया। वहीं Microsoft अपने इंजीनियरों को महंगे टूल्स के बजाय सस्ते विकल्पों की तरफ भेज रहा है। Meta और Amazon जैसी कंपनियां भी अब AI के खर्च पर नजर रखने के लिए अलग से डैशबोर्ड बना रही हैं।
बजट और मैनेजमेंट में बड़ी कमियां
IBM की एक स्टडी बताती है कि 86 प्रतिशत कंपनियों ने AI के पैसों के मैनेजमेंट का कोई सही तरीका नहीं बनाया है। कंपनियों को यह पता ही नहीं चल पा रहा है कि पैसा कहां खर्च हो रहा है और उससे कितना फायदा मिल रहा है। Gartner के एक्सपर्ट्स का कहना है कि 2027 तक करीब 80 प्रतिशत कंपनियों का बजट AI कोडिंग टूल्स की वजह से बिगड़ सकता है।
| कंपनी/संस्था |
मुख्य समस्या या अपडेट |
| Uber |
अप्रैल तक साल भर का बजट खत्म, अब लिमिट लगाई |
| Microsoft |
महंगे Claude Code से हटकर GitHub Copilot की ओर शिफ्ट |
| IBM Study |
85% लीडर्स के पास AI खर्च की रियल-टाइम जानकारी नहीं |
| Gartner |
2027 तक 80% कंपनियों के बजट में बड़ी बढ़ोतरी का अनुमान |
| UN News |
AI डेटा सेंटर्स से बिजली और पानी की भारी खपत |
Frequently Asked Questions (FAQs)
कंपनियों के लिए AI महंगा क्यों हो रहा है?
AI के इस्तेमाल में टोकन की खपत, महंगे सॉफ्टवेयर लाइसेंस और डेटा सेंटर्स के भारी बिजली खर्च की वजह से लागत बढ़ रही है। जेनरेटिव AI को चलाने के लिए साधारण AI के मुकाबले 100 गुना ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत होती है।
AI के पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है?
UN की रिपोर्ट के अनुसार, AI डेटा सेंटर्स 2030 तक सालाना 945 टेरावाट-घंटे बिजली खर्च कर सकते हैं। इसके अलावा, AI के जरिए इमेज बनाने में साधारण टेक्स्ट के मुकाबले हजार गुना ज्यादा ऊर्जा लगती है।